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ब्रह्माकुमारीज सच्चे अर्थों में भारत को विश्वगुरू बनाने का कार्य कर रहीं – शिवराज सिह चैहान

ब्रह्माकुमारीज सच्चे अर्थों में भारत को विश्वगुरू बनाने का कार्य कर रहीं – शिवराज सिह चैहान

भारत कों विश्वगुरू बनाने 7 दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव का दूसरा दिन

विदेशी कलाकारों नें वंदेमातरम नृत्य प्रस्तुत कर सभा को देशप्रेम के भाव से भर दिया

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भोपाल: 13 अक्टूबर

 

भारत प्राचीन देश है। यहां की सुस्कृति बहुत प्राचीन एवं पावन है। जब कई देशों में सभ्यता विकसित नहीं हुई थी उसके पहले हमारे देश में वेदों की रचना हो गई थी। ब्रह्माकुमारीज की दीदियां ईश्वरीय ज्ञान एवं राजयोग की साधना के द्वारा चरित्र का निर्माण कर ववित्र बनाकर ब्रह्म सवरून बना रही हैं। उन्होनें कहस कि मैं अपने आप को बहुत धन्य महसूस कर रहा हूं एवं मैं भी इस ईश्वरीय परिवार का सदस्य हूं। ब्रह्माकुमारीज भारत को विश्व गुरू बनानें में 1936 से लगातार कार्य कार्य रही हैं। उक्त उद्गार ब्रम्हाकुमारी भोपाल जोन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव के दूसरे दिन आयोजित मुख कार्यक्रम के दौरान मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमुत्री एवं भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवराज सिंह चैहान जी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के तौर पर व्यक्त किए ।

ब्रह्मकुमारीज मीडिया प्रभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजयोगी करूणा भाई जी नें कहा कि 140 देशों में ब्रह्माकुमारीज के सेवाकेन्द्र कार्य रहे हैं, जिनका संचालन बहनें करती हैं। ब्रह्माकुमारीज में तीन बातें सिखाई जाती हैं। एक ईश्वर, एक विश्व, एक परिवार। ब्रम्हाकुमारीज में 40000 समर्पित बहनें, 10000 समर्पित भाई, एवं 10 लाख परिवार प्रतिदिन ईश्वरीय ज्ञान एवं योग प्रतिदिन ब्रह्माकुमारीज में जाकर सीखते हैं। ब्रह्माकुमारीज के सदस्य प्रतिदिन 4 बजे से नींद का त्याब कर ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तपस्या करते है। ऐसे तपस्वियों के तप से भारत निश्चित ही निकट भविष्य में विश्व गुरू बन कर रहेगा।

वैज्ञानिका एवं अभियंता प्रभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.के. मोहन सिंहल जी नें कहा कि पूरे धरती एक कुटुंब हैं, जिसमें प्रकृति के पांच तत्व, जानवर एवं पक्षी भी आते हैं। ब्रह्माकुमारीज के संस्थापक प्रजापिता ब्रह्मा बाबा में सबको साथ लेकर चलनें की कला थी। वे सहज ही दूसरों के मन को जीत लेते थे। हमे भी दूसरों के मन जीतनें है। हमें जियो और जीने दो कि सिद्वांत पर चलकर सभी को जीनें का अवसर प्रदान करना है। पुरूष अर्थात आत्मा और प्रकृति के इस रंगमंच में हो रहे खेल को समझना है। धर्म अर्थात धारणओं की रक्षा एवं सम्मान करना है।